Education

हिन्दी भाषा ही भारतीय संस्कृति का मूलाधार है। (युगावतार हिन्दी)

यह सच है कि व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास अपनी भाषा के पठन-पाठन से ही सम्भव है, अन्य भाषा से नहीं। स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा था–‘‘हिन्दी के द्वारा ही भारत को एक सूत्र में बाँधा जा सकता है, क्योंकि भारतीय संस्कृति और सभ्यता का आधार हिन्दी ही है। आज की युवा पीढ़ी की दृष्टि में हिन्दी का कोई महत्त्व नहीं है, किन्तु अपनी भाषा के अभाव में भारतीय संस्कृति को सुरक्षित नहीं रखा जा सकता है।’’
आज सरकारें भी हिन्दी के उन्नयन हेतु कदम उठा रही हैं; जैसे–आई०ए०एस०, बैंक आदि की परीक्षाएँ भी हिन्दी माध्यम से करा रही हैं। पूर्व विदेश मंत्री ‘सुषमा स्वराज’ को श्रद्धांजलि देते हुए सुविख्यात कवि अशोक चक्रधर जी ने उनसे जुड़े संस्मरण बताते हुए कहा कि वह देश की ऐसी पहली विदेश मंत्री थीं, जिन्होंने हिन्दी के उत्थान हेतु अथक परिश्रम किया। पूर्व में विदेश मन्त्रालय में केवल अंगे्रजी भाषा को ही महत्त्व दिया जाता था, लेकिन सुषमा स्वराज जी ने अपने मंत्रालय में पुस्तकें हिन्दी में प्रकाशित कराईं। यहीं तक नहीं, अपने अधीन सचिव से लेकर अन्य अधिकारियों से अपने नोटिंग व ड्राफ्टिंग हिन्दी में ही शुरू कराए। हिन्दी सॉफ्टवेयर के प्रति भी अपनी रुचि बढ़ाई। सुषमा जी भारतीय संस्कृति के संरक्षण और संवद्र्धन में हिन्दी को ही मुख्य मानती थीं।

सभी शिक्षाविदों को, शिक्षकों को तथा अभिभावकों को हिन्दी-प्रचार व प्रसार में अपनी भूमिका निभाते हुए आगे आना चाहिए।

लेकिन दुर्भाग्य है कि 14 सितम्बर, 1949 से राजभाषा का मान प्राप्त किए हुए हिन्दी भाषा जनमानष की भाषा नहीं बन सकी। पाश्चात्य संस्कृति इस कदर हावी होती जा रही है कि अंगे्रजी भाषा को उन्नति का आधार मान बैठे हैं, जबकि ऐसा नहीं है। हम सभी हिन्दी-दिवस, पखवाड़े, सप्ताह मनाते तो हैं, लेकिन घूम-फिरकर उसी अंगे्रजी भाषा के चक्कर लगाते हुए अपनी भाषा को भुला देते हैं।
अन्त में यही कहा जा सकता है कि हम भारतीयों को अपनी मातृभाषा हिन्दी के संवर्द्धन हेतु सतत प्रयास करना चाहिए, जिससे आने वाली युवा पीढ़ियाँ यह समझ सकें कि हमारी संस्कृति और सभ्यता की नींव हिन्दी भाषा ही है। हिन्दी को युगावतार कहकर यह कहा जा सकता है–
‘‘हिन्दी सत्त के गलियारे में अन्धों की लकड़ी बन जाएगी, भटक रहे जो लक्ष्य भुलाकार, उनको पथ दिखलाएगी।हिम्मत हारे मनुजों को पुन: हिम्मत बँधाएगी, सूखे नीरस प्राणों में हिन्दी, रस सुधा सदा बरसाएगी।अहम् तोड़कर आगे बढ़ें, युगावतार बनेगी हिन्दी, हृदय के सिंहासन पर सजेगी, हिन्दी की ही बिन्दी।।’’
संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि सभी शिक्षाविदों को, शिक्षकों को तथा अभिभावकों को हिन्दी-प्रचार व प्रसार में अपनी भूमिका निभाते हुए आगे आना चाहिए, जिससे भारतीय सभ्यता उन्नति के रथ पर सदैव विराजमान बनी रहे। पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव युवा पीढ़ी पर न पड़े, इस ओर हम सभी का लक्ष्य बना रहे।

Leave a Reply